सिर्फ
अपने लिए जिये तो क्या जिये
कोल्कता के हावड़ा रेलवे स्टेशन
के नजदीक स्थित सारे होटल खचाखच भरे थे। कहीं भी रूम उपलब्ध नहीं था। वजह थी,
गंगासागर मेला। इस मेले में शामिल होने के लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश,
बिहार, महाराष्ट्, झारखण्ड और गुजरात समेत कई राज्यों से तीर्थयात्री आते हैं, ये
तो अच्छा हुआ कि शुभम दिल्ली से दो दिन पहले ही यहां आ गया था। दरअसल उसे दो अलग
अलग कम्पनियों में इंटरव्यू देने थे औऱ कोलकाता घूमने की इच्छा भी थी। सोचा पहले
इंटरव्यू देगा फिर घूम लेगा इसलिए वह एक दिन का टाइम हाथ में लेकर आया था। लेकिन
आज उसका मूड बिल्कुल ठीक नहीं था क्योंकि दोनों जगहों पर उसे नौकरी मिलने का कोई
चांस नजर नहीं आया। निराश मन से वह अपने रूम में जाकर आराम करने की सोच रहा था,
तभी रिसेप्शन काउंटर पर किसी शर्मा दम्पत्ति को गिड़गिड़ाते देखा। बातचीत से मालूम
पड़ रहा था कि दोनों कई होटलों में धक्के खाकर आ चुके थे औऱ उन्हें कहीं कमरा नहीं
मिला था.इसीलिए पति और पत्नी दोनों मैनेजर से किसी भी तरह रूम की व्यवस्था करने का
निवेदन कर रहे थे। शुभम को वे भले लोग लगे। उसने मैनेजर से पूछा, कि अगर वह शर्मा
दम्पत्ति को अपने कमरे में ठहरने दे तो उसे कोई आपत्ति तो नहीं। मैनेजर ने कुछ
सोचकर उसे अनुमति दे दी। अधेड़ दम्पत्ति शुभम के गुण गाते नहीं थक रहे थे। शुभम
नीचे दरी बिछाकर सो गया औऱ बेड दम्पति को दे दिया। बाद में बातें हुई तो शुभम ने
बताया कि वह नौकरी खोजने के सिलसिले में कोलकाता आया है। पता चला कि शर्मा
दम्पत्ति भी दिल्ली से ही आया था और कोलकाता में शर्मा लोजिस्टिक कम्पनी के मालिक
का रिश्तेदार है। कम्पनी का नाम सुनते ही शुभम चौंक गया। उसने बताया कि वह भी कल
शर्मा लौजिस्टिक कम्पनी में ही इंटरव्यू देकर आया था। यह बात सुनते ही शर्मा जी ने
तुरंत अपने रिश्तेदार को फोन लगाया औऱ
शुभम के बारे में जिक्र करते हुए उन्हें सारी बात बताई। बस बात बन गई। शुभम
को कम्पनी में नौकरी मिल गई। अपनी दयालुता और नरमदिली के कारण शुभम खाली हाथ
दिल्ली लौटने से बच गया।
व्यवहार विशेषज्ञ,
मनोविज्ञानी और समाज शास्त्री मानते हैं
कि जरा सी नरमदिली, दूसरों के प्रति सहानुभूति और दयालुता का भाव आपको जीवन में
बहुत कुछ दे सकता है। इससे आपको खुशी, सामाजिक प्रतिष्ठा औऱ जीवन में सफलता मिलती
है। एक पुरानी फिल्म का गाना भी हमें दयालुता का संदेश देता है, ‘अपने लिए जिए तो
क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए।’ अपने नर्म, सहयोगी औऱ दयालु स्वभाव के
प्रदर्शन के लिए आपको बहुत बड़े बड़े काम नहीं करने पड़ते। अपनी छोटी छोटी प्रतिक्रियाओं से भी आप लोगों
का दिल जीत सकते हैं। जैसे भीड़ भरी बस में किसी बुजुर्ग, महिला या स्कूल से लौटती
बच्ची को अपनी सीट देकर, बिल जमा देने वाली लाइन में किसी परेशान व्यक्ति की मदद
करके, रास्ते में जल्दी में दिख रहे किसी कार या बाइक सवार को आगे निकलने का
रास्ता देकर, हाथ में भारी थैला लेकर व्यस्त सड़क पार करने की कोशिश कर रहे किसी
बुजुर्ग की सहायता करके आफ अपनी नरमदिली का परिचय दे सकते हैं। इससे आपको भी
दिलमें सुकून और खुशी महसूस होगी।
इंसानियत के कारण ही
हमारा अस्तित्व
‘सर्वाइवल औफ दी नाइसेस्ट’ यानी अच्छे लोगों का अस्तित्व बना रहता है
के सिद्धान्त के अनुसार मानवजाति आजतक बची हुई है और निरंतर तरक्की पर है, तो अपनी दयालुता के कारण ही है। यूएस की
सांता फे इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता प्रोफेसर सौम बोवेलस ने प्राचीन संस्कृतियों का
विश्लेषण करने पर पाया है कि उनके अस्तित्व में दयालुता एक मह्तवपूर्ण कारण थी।
जिस समाज में दयालुता हो औऱ अन्य सदस्यों के प्रति सहयोग का भाव हो, वह समाज लंबे
समय तक अस्तित्व में रहता है। इनका कहना है कि हम इंसानों में अपने नजदीकी लोगों
की मदद करने की कुदरती आदत और क्षमता होती है, इसका उपयोग करके हम अपने समाज को
दीर्घ समय तक अस्तित्व में रख सकते हैं।
मिलती है खुशी और
सफलता
यूनिवर्सिटी ऑफ
कैलिफोर्निया की प्रोफेसर सोंजा ल्यूबोमिस्क्री ने एक अध्ययन के दौरान
प्रतिभागियों से लगातार दस हफ्तों तक दयालुता औऱ नरमदिली दर्शाने वाले काम करने को
कहा। ये बहुत छोटे छोटे काम थे जैसे, किसी अजनबी के लिए दरवाजे को खोलकर पकड़े रखना,
अपने रूममेट के कपड़े समेट कर रख देना, थाली पर बैठे किसी व्यक्ति के लिए किचन से
रोटी लाकर दे देना आदि। प्रोफेसर सोंजा ने पाया कि अध्ययन के एक महीने बाद भी ऐसे
काम करने वालो की खुशी का स्तर काफी ऊंचा था।
प्रोफेसर सोंजा कहती हैं,
‘दयालुता का एक छोटा सा काम भी आपको अच्छी अनुभूति देता है। आप खुद को एक अच्छा
आदमी समझते हैं। इससे आपको एक नया मित्र और दुआ भी मिलती है। लोगों के साथ अच्छे
संबंध बनते हैं और आपका सामाजिक सम्मान बढ़ता है।साथ ही, किसी के आड़े वक्त में काम
आकर आप उसका दिल जीत लेते हैं तो पता नहीं वह व्यक्ति आपकी कब, कहाँ और कैसे मदद
कर दे. इससे आपका कोई बिगड़ता हुआ काम बन सकता है.’ प्रोफ़ेसर सोंजा की बात सही है,
शुभम शर्मा दंपत्ति की मदद नहीं करता तो उसे वह नौकरी शायद कभी नहीं मिलती.
महान दार्शनिक एवं लेखक
एल्डस लियोनार्ड हक्सले ने अपनी मृत्यु शैय्या पर जीवन भर के अनुभवों के मात्र चंद
शब्दों में समेटते हुए कहा था, ‘हम सब को एक दूसरे के प्रति दयालु होना चाहिए।’
अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई बेस्ट सेलर किताबों के
लेखक, प्रभावशाली ब्लौगर एवं प्रेरक वक्ता रौबिन शर्मा कहते हैं, ‘अगर आप दिन भर
में एक व्यक्ति के भी चेहरे पर मुस्कान ला देते हैं, समझ लें कि आपका वह दिन सचमुच
सार्थक रहा। दयालुता, इस ग्रह पर रहने का किराया है, जो हम सब को चुकाना चाहिए।’
सेहत पर अच्छा असर
‘व्हाई गुड थिंग्स हैपन तो गुड पीपल’ के लेखक प्रोफेसर स्टीफन पोस्ट
ने अपने अध्ययन पाया कि दयालु होना सेहत
के लिए भी अच्छा होता है। 2000 से ज्यादा लोगों पर किए गए एक अध्ययन के नतीजे
बताते हैं कि जो लोग नियमित रूप से दूसरों की भलाई के लिए कुछ करते हैं उनमें
डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों की संभावना कम रहती है और नका मानसिक स्वास्थ्य दूसरों
की तुलना में बेहतर होता है। कुछ अन्य अध्ययनों में पाया गया है कि दूसरों की मदद
करने वाले लोगं का इम्यून सिस्टम बेहतर होताहै औऱ उनके क्रौनिक डिजीज से बीमार
पड़ने की संभावना कम होती है। स्टीफन पोस्ट कहते हैं, ‘स्वस्थ रहने, खुश रहने और
नरमदिल होने में गहरा संबंध है। दयालुता भावनाओं को रेगुलेट करती है, जिसका हमारी
सेहत पर सकारात्मक पर्भाव पड़ता है। नरमदिल और दयालु लोग अक्सर शांत स्वभाव के
होते हैं जिससे वे स्ट्रेस के शिकार नहीं होते। जबकि स्ट्रेस के शिकार होने वाले
लोगों का कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम बुरी
तरह प्रभावित होता है औऱ साथ ही इम्यूनिटी सिस्टम को भी प्रभावित करता है।
सन् 2005 में इजरायल की
हिब्रू यूनिवर्सिटी के वैज्ञानियों ने अपने अध्ययन में दयालुता औऱ एक जीन में
संबंध पाया। यह जीन डोपामाइन नमक फील गुड न्यूरोट्रांसमीटर का मस्तिष्क में
उत्सर्जन करता है। 1991 में ‘दी हीलिंग पावर औफ डूइंग गुड’ के लेखक एलेन लुक्स ने
पाया कि मददगार स्वभाव के लोगों ने खुद में ऊर्जा, गर्मजोशी, उच्च आत्ममूल्य और प्रतिष्ठा महसूस की। इस प्रवृत्ति को लुक्स
ने ‘हेल्पर्स हाई’ नाम दिया।
‘पे इट फौरवर्ड’ नामक
किताब की लेखिका कैथरीन रियान हाइड कहती हैं, ‘दयालुता के किसी भी कार्य से हमें
आंतरिक खुशी मिलती है।’ इनकी किताब में एक ऐसे स्कूल बच्चे की कहानी है जिसने
निश्चय किय़ा है कि वह प्रति दया या मदद के किसी भी एक कार्य के बदले दूसरे लोगों
के तीन अच्छे काम करेगा। यह किताब काफी लोकप्रिय हुई। इस पर फिल्म बनी और खूब हिट
भी हुई। उस समय लोगों ने इस फिल्म से प्रेरित होकर आन्दोलन भी चलाया था।
इंसानियत का पर्याय
है दयालुता
दयालुता के लिए हम
सामान्यतया ‘इंसानियत’ या ‘मानवता’ शब्द का भी प्रयोग करते हैं। यानी यह इंसान का एक बेहद
महत्वपूर्ण गुण है। निर्दयी या क्रूर लोगों के लिए अक्सर हम कह देते हैं कि इसकी
मानवता मर गई या इसमे इंसानित नाम की चीज नहीं।
प्रोफेसर सोंजा कहती हैं,
‘हमे हर रोज दयालुता का कोई न कोई काम जरूर करना चाहिए। भले ही आप निस्वार्थ भाव
से किसी की मदद करें लेकिन इसका फायदा आफको किसी न किसी रूप मे जरूर मिल जाता है।
चाहे वह खुशी के रूप में हो, सामाजिक प्रतिष्ठा के रूप में हो या समय आने पर सामने
वाले द्वारा आपकी भलाई के रूप में हो।’
दयालुता के माध्यम से आप
सिर्फ दूसरों की जिंदगी में ही नहीं खुद की जिंदगी में भी कई छोटे- बड़े सकारात्मक
बदलाव ला सकते हैं।




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