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Showing posts from September, 2018

अच्छी आदत है सलाम नमस्ते!

अच्छी आदत है सलाम नमस्ते !   एक जमाना था जब किसी गांव में रहने वाला हर शख्स एक दूसरे को न सिर्फ नाम से जानता था बल्कि उसके परिवार के बारे में भी काफी हद तक जानकारी रखता था। तब गांव के लोग एक दूसरे से मिलने पर चलते-चलते ही सही ‘राम-राम’ ‘सलाम वालेकुम’ या ‘सत श्री अकाल’ जैसे अभिवादन का आदान प्रदान जरूर करते थे। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि एक ही सोसायटी या अपार्टमेंट अथवा बिल्डिंग में रहने वाले दो लोग न तो एक दूसरे को नाम से जानते हैं और न ही उनमें कभी कोई बातचीत होती है। कौन है अजनबी?   अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि किसी अजनबी से भला क्या अभिवादन किया जाए। लेकिन यह गलत नजरिया है। एक ही अपार्टमेंट या सोसायटी या फिर ऑफिस प्रेमिसेस में रहने वाले लोग अजनबी नहीं कहे जा सकते। वैसे तो एक ही छत के नीचे रहने वाले सगे भाई-बहन भी जब एक-दूसरे से बातचीत नहीं करते तो अजनबी ही कहलाते हैं. इसलिए यह संकोच त्यागिये और आगे बढकर लोगों से पहचान बढ़ाइए. आप ही होंगे पॉपुलर -   अगर आप पहल करके लोगों से सलाम-नमस्ते यानी मुस्कुराकर अभिवादन करने की आदत डालते हैं, तो इसका सका...
खुद ही न बन जाएं अपने करियर के दुश्मन “लक्ष्मी” के आगमन में अड़चन की वजह आप खुद ही तो नहीं ! अगर आप तमाम कोशिशों के बावजूद मनचाही कमाई नहीं कर पा रहे और करियर में वांछित स्थान हासिल नहीं कर पा रहे तो आपको   कुछ खास बातों का खयाल रखना होगा और कुछ गलतियों से दूरी रखनी होगी वरना अनजाने में आप खुद ही अपने करियर की राह के रोड़े बन जाएँगे. बातें बड़ी और काम छोटा – आपने सबसे बड़े-बड़े वायदे कर दिए हैं और अब लोग आपसे अपेक्षा कर रहे हैं। लेकिन आप हैं कि हर जगह फेल होते जा रहे हैं. सबको टरका रहे हैं. बॉस द्वारा दी गई डेडलाइन्स में अपना काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। क्वालिटी ऑडिट में आप के काम की रैंक सबसे नीचे आती है. आपका ये ड्रामा ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला. जल्द ही लोग आपको अविश्वसनीय मानने लगेंगे। वादा उतना ही करना चाहिए, जितना आप पूरा कर सकते हैं। समय पर काम पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करें। अपनी इमेज विश्वसनीय बनाएं। क्षमता पर यकीन नहीं करते – अगर आप अपनी क्षमताओं को लेकर चिंतित होते हैं और नए काम हाथ में लेने से डरते हैं तो इस प्रकार खुद को कमजोर करते हैं। अपन...

पॉजिटिव हो ‘सेल्फ इमेज’

पॉजिटिव हो ‘सेल्फ इमेज’ ‘सेल्फ इमेज’ एक मानसिक तस्वीर है जो कोई व्यक्ति खुद के बारे में बनाता है। यह आत्म छवि जीवन में कड़वे-मीठे अनुभवों व जिन्दगी के प्रति आपके नजरिए से बनती है। इसमें हमारे आत्मविश्वास की बड़ी भूमिका होती है। हम खुद को कितना मूल्यवान आंकते हैं, खुद से कितना प्यार करते हैं और खुद को कितना स्वीकार करते हैं, इन सब पर ही आत्मछवि के अच्छा या बुरा होने का दारोमदार होता है। जिन लोगों को अपनी ही आलोचना करने, खुद को कोसने या कमतर आंकने की आदत पड़ जाती है, वे जिंदगी में कभी कुछ अच्छा नहीं कर पाते। ये बस किसी तरह अपना जीवन बिताते चले जाते हैं, लेकिन जिंदगी को जी भर के न तो जी पाते हैं और न कुछ बड़ा और उल्लेखनीय कर पाते हैं। इसलिए हमें अपनी आत्मछवि बेहतर गढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। नुकसान कमजोर आत्मछवि और लो सेल्फ एस्टीम के v   निर्णय लेने की क्षमता नहीं रहती। हर वक्त डर लगता है कि कोई गलती न हो जाए। v   हर वक्त उदासी घेरे रखती है और खुलकर न हंस पाते हैं, न किसी जोक का लुफ्त उठा पाते हैं। v   दूसरों के साथ कभी घुलमिल नहीं पाते। हमेशा संशय की स...

सिर्फ अपने लिए जिए तो क्या जिए?

सिर्फ अपने लिए जिए तो क्या जिए? एक पुरानी फिल्म का गाना है, ‘अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए।’ यह गाना आज के स्वार्थ प्रधान युग में वाकई जिंदगी को खुशगवार बनाने के लिए एक सार्थक सन्देश देने वाला है.रिलेशनशिप एक्सपर्ट, साइकिएट्रिस्ट और सोशियोलोजिस्ट भी मानते हैं कि जरा सी नरमदिली, दूसरों के प्रति सहानुभूति और दयालुता का भाव आपको जीवन में बहुत कुछ दे सकता है। इससे आपको खुशी,   सफलता और समाज में इज्जत मिलती है। अपने नर्म, सहयोगी औऱ दयालु स्वभाव के इजहार के लिए आपको बहुत बड़े बड़े काम नहीं करने पड़ते। छोटी छोटी आदतों या एक्टिविटीज से भी आप लोगों का दिल जीत सकते हैं। जैसे भीड़ भरी बस में किसी बुजुर्ग, महिला या स्कूल से लौटती बच्ची को अपनी सीट देकर, बिल जमा देने वाली लाइन में किसी परेशान व्यक्ति की मदद करके, रास्ते में जल्दी में दिख रहे किसी कार या बाइक सवार को आगे निकलने का रास्ता देकर, हाथ में भारी थैला लेकर व्यस्त सड़क पार करने की कोशिश कर रहे किसी बुजुर्ग की सहायता करके आफ अपनी नरमदिली का परिचय दे सकते हैं। इससे आपको भी दिलमें सुकून और खुशी महसूस होगी। ...

कभी दूसरों की नजर से भी देखिए जिंदगी

कभी दूसरों की नजर से भी देखिए जिंदगी       किसी भी दिन का अखबार उठाकर देख लीजिए, रोज इंसानियत और रिश्तों को शर्मसार करनेवाली खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं। 8 माह की बच्ची का बलात्कार हो रहा है, पिता बेटी के साथ ऐसा कुकर्म कर रहा है, जिनकी कल्पना मात्र से आपके पैरों तले की धरती फट जाए, बेटा बीमार बूढ़ी मां को छत से धकेलकर नीचे गिरा देता है, छोटे-छोटे बच्चे और टीनेजर्स खेलने-कूदने और मस्ती की उम्र में एक दूसरे की गला रेत कर हत्या कर देते हैं। ये घटनाएं इतनी आम होती जा रही हैं कि यहां इनके घटने के स्थान और समय का जिक्र करना ही बेमानी है। वजह यह है कि देश के लगभग हर राज्य में, हर शहर में ऐसी घटनाएं घटने लगी हैं।       क्या अभी आपने सोचा है कि हमारे समाज में इतनी नैतिक और भावनात्मक गिरावट कैसे आ गई है ? किसी हरे-भरे पेड़ जैसे लहलहाते रिश्ते और इंसानियत सूखे ठूंठ जैसे बेजान और कठोर कैसे होते जा रहे हैं ? दरअसल यह समानुभूति यानी इम्पैथी की कमी के कारण हो रहा है। हम सब कुछ अपने ही नजरिए से देखने की बुरी आदत पाल बैठे हैं। दूसरे के स्था...